
आलू में दवा छिड़काव का पूरा कार्यक्रम — रोपाई से कटाई तक हफ्ते-दर-हफ्ते (2026)
आलू में छिड़काव कार्यक्रम फसल की उम्र और रोग-कीट के दबाव पर निर्भर करता है — आम तौर पर 100 दिन के मौसम में 8 से 10 छिड़काव की ज़रूरत होती है। <strong>चार मुख्य चरण:</strong> (1) <strong>रोपाई से 30 दिन तक</strong> — जड़ें जमने का समय, मिट्टी-जनित रोग और शुरुआती कीट; (2) <strong>30-60 दिन</strong> — पौधे की बढ़त का चरम समय, अगेती झुलसा (Alternaria) और पछेती झुलसा (Phytophthora) से बचाव सबसे ज़रूरी, माहू (चेंपा) का प्रकोप शुरू; (3) <strong>60-90 दिन</strong> — कंद बनने का समय, फफूंदनाशी से सुरक्षा और कीट निगरानी; (4) <strong>90 दिन के बाद</strong> — कटाई की तैयारी, बेल काटना। मुख्य फफूंदनाशी: मैन्कोज़ेब (Mancozeb — सामान्य बचाव), मेटालैक्सिल + मैन्कोज़ेब (पछेती झुलसा का इलाज), साइमोक्सानिल (Cymoxanil — इलाज), क्लोरोथैलोनिल (अगेती झुलसा)। मुख्य कीटनाशी: इमिडाक्लोप्रिड (Imidacloprid — माहू), स्पिनोसैड या क्लोरांट्रानिलिप्रोल (कतरन कीड़ा, पत्ती सुरंगक)। प्रति एकड़ प्रति छिड़काव ₹500-900 का अनुमानित खर्च; पूरे मौसम का कुल खर्च ₹4,000-7,000 प्रति एकड़। हर छिड़काव से पहले अपनी किस्म, रोग का दबाव और स्थानीय कृषि विज्ञान केंद्र (KVK) से सलाह ज़रूर लें — यह गाइड सामान्य संदर्भ है, हर खेत की डॉक्टरी सलाह नहीं।
आलू की फसल कम समय (90-110 दिन) में तैयार होने वाली पर रोग-कीट का दबाव बहुत झेलने वाली फसल है। पछेती झुलसा का एक भी प्रकोप ठीक से न संभाला गया तो 7-10 दिन में पूरी फसल चौपट हो जाती है। बीज वाली फसल में माहू (चेंपा) से विषाणु फैलते हैं और प्रमाणित बीज की कीमत ज़ीरो हो जाती है। कंदशलभ खेत में नुक़सान करता है और फिर भंडार में जाकर और बढ़ जाता है। दुख की बात यह है कि भारत के अधिकांश आलू उगाने वाले इलाक़ों में आज भी छिड़काव "कैलेंडर देखकर" या "पड़ोसी को देखकर" होता है — असली रोग-कीट का दबाव जाँचे बिना। नतीजा: या तो ज़्यादा छिड़काव (फ़ालतू खर्च, फसल में दवा के अवशेष, दवा बेअसर हो जाती है), या कम छिड़काव (पैदावार में नुक़सान, आख़िरी समय में घबराहट)।
यह गाइड हफ्ते-दर-हफ्ते का पूरा कार्यक्रम देती है — रोपाई से कटाई तक — मुख्य रूप से उत्तर भारत के मैदानी आलू-चक्र (अक्टूबर-नवंबर रोपाई, जनवरी-फ़रवरी कटाई) के लिए। दक्षिण भारत, पहाड़ी इलाक़े, या गर्मी की फसल के लिए समय थोड़ा बदल जाता है, पर रोग-कीट का तरीक़ा एक जैसा होता है। दवाओं के नाम, मात्राएं और अनुमानित खर्च केंद्रीय कीटनाशक बोर्ड (CIB-RC) के मंज़ूर लेबलों और ICAR-CPRI (केंद्रीय आलू अनुसंधान संस्थान, शिमला) की सिफ़ारिशों से लिए गए हैं।
फसल के चार ज़रूरी चरण
आलू के 100-दिन के चक्र को चार अलग-अलग चरणों में बाँटा जा सकता है। हर चरण में अलग रोग-कीट सामने आते हैं, और छिड़काव का तरीक़ा भी बदलना पड़ता है।
पहला चरण (रोपाई से 30 दिन — पौधे निकलने से शुरुआती बढ़त तक): यह जड़ें जमने का समय है। ऊपर पौधा कम, पत्तियां नई और कोमल। मुख्य चिंता: मिट्टी-जनित रोग (राइज़ोक्टोनिया, साधारण खुरंड — बीज उपचार से ज़्यादातर ठीक हो जाते हैं), शुरुआती माहू (खासकर बीज वाली फसल में), और कतरन कीड़ा से नए अंकुरों को नुक़सान। मैन्कोज़ेब का बचाव छिड़काव + इमिडाक्लोप्रिड का माहू-छिड़काव — यह आम तरीक़ा है।
दूसरा चरण (30-60 दिन — पौधे की सबसे तेज़ बढ़त): यह सबसे ख़तरनाक समय है। पौधा पूरी तरह फैल जाता है, और पत्तियों के नीचे नमी ज़्यादा हो जाती है। पछेती झुलसा (Phytophthora) और अगेती झुलसा (Alternaria) — दोनों का असली समय यही है। कई राज्यों में IMD-CPRI मिलकर पछेती झुलसा का पूर्वानुमान देते हैं — इस समय हर 2-3 दिन में चेक करते रहें। माहू तेज़ी से फैलता है। पत्ती सुरंगक (Liriomyza) का नुक़सान शुरू। हर हफ्ते मैन्कोज़ेब का बचाव छिड़काव ज़रूरी; रोग दिखे तो मेटालैक्सिल/साइमोक्सानिल का इलाज छिड़काव।
तीसरा चरण (60-90 दिन — कंद बनने का समय): पैदावार बनने का समय। फफूंदनाशी से सुरक्षा जारी रखें (ऊपरी पत्तियां अभी भी पछेती झुलसा के लिए नाज़ुक हैं), कीटों की निगरानी, और खाद-पानी का सही प्रबंधन ज़रूरी। पोटाश की सही मात्रा कंद का आकार बढ़ाने में मदद करती है। इस चरण में पछेती झुलसा का तेज़ प्रकोप पूरी फसल बर्बाद कर सकता है।
चौथा चरण (90 दिन के बाद — पकने और कटाई की तैयारी): पत्तियां पीली पड़ने लगती हैं, बेल काटने (dehaulming) की तैयारी। इस समय कीट-नुक़सान (खासकर कंदशलभ) बढ़ जाता है क्योंकि पौधा कमज़ोर होता है। कटाई-पूर्व अंतराल (PHI) का ध्यान रखें — दवा के अवशेष कंद में जमा न हों। आख़िरी छिड़काव कटाई से 14-21 दिन पहले (हर दवा के लेबल पर PHI लिखा होता है)।
हफ्ते-दर-हफ्ते छिड़काव कार्यक्रम (उत्तर भारत — रबी फसल)
बीज उपचार
मैन्कोज़ेब 75% WP @ 3-5 ग्राम/किलो + इमिडाक्लोप्रिड 70% WS @ 7 ग्राम/किलो — मिट्टी-जनित रोग और शुरुआती माहू से बचाव
पहला छिड़काव
मैन्कोज़ेब 75% WP @ 2 ग्राम/लीटर + इमिडाक्लोप्रिड 17.8% SL @ 0.3 मिली/लीटर — सामान्य बचाव
मिट्टी चढ़ाना + छिड़काव
पहली बार मिट्टी चढ़ाना; मैन्कोज़ेब @ 2 ग्राम/लीटर बचाव छिड़काव; माहू दिखे तो एसिटामिप्रिड @ 0.4 ग्राम/लीटर
पछेती झुलसा का समय
मेटालैक्सिल 8% + मैन्कोज़ेब 64% @ 2.5 ग्राम/लीटर — अगर पछेती झुलसा का पूर्वानुमान मिले; नहीं तो मैन्कोज़ेब चालू रखें
रोग का चरम
साइमोक्सानिल 8% + मैन्कोज़ेब 64% @ 3 ग्राम/लीटर (पछेती झुलसा का इलाज); अगेती झुलसा के लिए क्लोरोथैलोनिल
कंद बनने का समय
एज़ोक्सिस्ट्रोबिन 23% SC @ 1 मिली/लीटर (अंदर तक जाने वाली सुरक्षा); कंदशलभ हो तो स्पिनोसैड
अंतिम चरण
आख़िरी मैन्कोज़ेब छिड़काव (PHI ध्यान में रखें); कंदशलभ के लिए क्लोरांट्रानिलिप्रोल; कटाई-पूर्व अंतराल मानें
बेल काटना और कटाई
बेल काटें (मशीन से या डाइक्वैट 20% SL — क्षेत्र पर निर्भर); 7-10 दिन रुकें, फिर कटाई करें
यह कार्यक्रम सिर्फ़ संदर्भ है — असली छिड़काव रोग के पूर्वानुमान (IMD-CPRI की पछेती झुलसा सूचना), खेत की निगरानी और किस्म के हिसाब से तय होना चाहिए। प्रतिरोधी किस्में (Kufri Girdhari, Kufri Himalini) में पछेती झुलसा का दबाव कम होता है, इसलिए छिड़काव की ज़रूरत भी कम।
आम दवाओं की सूची (CIB-RC मंज़ूर)
फफूंदनाशी (फफूंदी/रोग के लिए):
- मैन्कोज़ेब (Mancozeb) 75% WP — सामान्य बचाव वाली दवा, हर हफ्ते लगाने के लिए मुख्य; अंदर तक नहीं जाती
- मेटालैक्सिल + मैन्कोज़ेब (Metalaxyl + Mancozeb) — अंदर तक जाने वाली + बाहरी सुरक्षा, पछेती झुलसा का इलाज; एक मौसम में अधिकतम 3 छिड़काव
- साइमोक्सानिल + मैन्कोज़ेब (Cymoxanil + Mancozeb) — हल्की-अंदर तक जाने वाली, मेटालैक्सिल के साथ बारी-बारी
- क्लोरोथैलोनिल (Chlorothalonil) 75% WP — सामान्य बचाव, खासकर अगेती झुलसा के लिए
- एज़ोक्सिस्ट्रोबिन (Azoxystrobin) 23% SC — अंदर तक जाने वाली, दोनों रोगों पर असरदार
- कॉपर-आधारित (बोर्डो मिश्रण, कॉपर हाइड्रॉक्साइड) — जैविक खेती के लिए, असर कम पर सुरक्षित
कीटनाशी (कीटों के लिए):
- इमिडाक्लोप्रिड (Imidacloprid) 17.8% SL — माहू/जैसिड के लिए मुख्य दवा
- थायामेथोक्सम (Thiamethoxam) 25% WG — इमिडाक्लोप्रिड का विकल्प
- एसिटामिप्रिड (Acetamiprid) 20% SP — थोड़ा अलग असर वाला विकल्प
- स्पाइरोटेट्रामैट (Spirotetramat) 150 OD — माहू कॉलोनी पर खास असर
- स्पिनोसैड (Spinosad) 45% SC — सूंडी/पत्ती सुरंगक/कंदशलभ
- क्लोरांट्रानिलिप्रोल (Chlorantraniliprole) 18.5% SC — पतंगा/सूंडी पर लंबा असर
- साइपरमेथ्रिन (Cypermethrin) 25% EC — सामान्य कीटनाशी (आख़िरी विकल्प, प्रतिरोधक क्षमता बन सकती है)
दवाओं को बारी-बारी बदलना बहुत ज़रूरी है — एक ही समूह की दवा बार-बार लगाने से कीट या रोग में प्रतिरोधक क्षमता तेज़ी से बन जाती है। नियम: हर छिड़काव में अलग कार्य-तरीक़े वाली दवा चुनें।
6 आम गलतियाँ
- निगरानी के बजाय कैलेंडर से छिड़काव — सिर्फ़ "पड़ोसी कर रहा है" देखकर। नतीजा: ज़्यादा खर्च, फ़ालतू दवा, प्रतिरोधक क्षमता बनती है। फेरोमोन ट्रैप + खेत की नज़र से रोग-कीट देखकर ही छिड़काव करें।
- एक ही दवा बार-बार — मैन्कोज़ेब या इमिडाक्लोप्रिड लगातार 5-6 बार। जल्दी ही दवा बेअसर हो जाती है। अलग-अलग कार्य-तरीक़े वाली दवाएं बारी-बारी ज़रूरी।
- ग़लत मात्रा या पतलापन — लेबल से ज़्यादा (पौधे को नुक़सान, कंद में अवशेष) या कम (दवा बेअसर → प्रतिरोधक क्षमता)। लेबल पर लिखी मात्रा का सख़्ती से पालन करें।
- ग़लत समय छिड़काव — दोपहर तेज़ धूप में (दवा उड़ जाती है), बारिश से पहले (धुल जाती है), तेज़ हवा में (फैल जाती है)। सुबह 6-10 बजे या शाम 4-7 बजे ही सही।
- कटाई-पूर्व अंतराल (PHI) न मानना — आख़िरी छिड़काव से कटाई तक का न्यूनतम समय हर दवा के लिए अलग होता है (आम तौर पर 14-21 दिन)। न मानने से कंद में दवा के अवशेष, निर्यात अस्वीकार, और सेहत को ख़तरा।
- सुरक्षा उपकरण न पहनना — पूरी बाजू वाले कपड़े, दस्ताने, मास्क, चश्मा — बिना इनके छिड़काव से तुरंत और लंबे समय तक सेहत को नुक़सान। ख़ासकर ऑर्गेनोफ़ॉस्फ़ेट और कार्बामेट दवाओं में सख़्ती ज़रूरी।
छिड़काव से पहले की जाँच-सूची
- दवा का लेबल पढ़ें — मात्रा, कितना पानी, कटाई-पूर्व अंतराल, कौन से रोग-कीट के लिए, दवा का समूह।
- छिड़काव यंत्र की सही सेटिंग — नोज़ल का सही आकार, पानी का दबाव, दवा का सही फैलाव।
- 48 घंटे का मौसम पूर्वानुमान — बारिश, हवा, तापमान देखें।
- पानी की जाँच — pH 6-6.5 सबसे अच्छा; pH ज़्यादा हो तो नींबू/सिट्रिक एसिड की कुछ बूंदें मिलाएं।
- दवाओं का मेल — सभी दवाएं एक साथ मिलाई जा सकती हैं या नहीं (कई फफूंदनाशी और कीटनाशी एक साथ नहीं मिलते)।
- सुरक्षा उपकरण तैयार — पूरी बाजू, दस्ताने, मास्क, चश्मा, बदलने के कपड़े।
- छिड़काव का समय — सुबह 6-10 बजे या शाम 4-7 बजे।
- पहले खेत की नज़र — असली रोग-कीट का दबाव देखें (कैलेंडर से नहीं)।
- कटाई-पूर्व अंतराल — आख़िरी छिड़काव से कटाई तक का न्यूनतम समय लेबल के हिसाब से।
- खाली डिब्बे का निपटान — तीन बार पानी से धोएं, फोड़ें, ढंग से फेंकें (बच्चे/जानवर से दूर)।
अंतिम सुझाव
आलू में छिड़काव के तरीक़े में सबसे बड़ा बदलाव यह है कि कैलेंडर देखकर छिड़काव करने के बजाय निगरानी करके (IPM के तरीक़े से) छिड़काव करें। निगरानी के औज़ार (फेरोमोन ट्रैप, पीले चिपचिपे कार्ड, खेत में नियमित नज़र), पूर्वानुमान तंत्र (IMD-CPRI की पछेती झुलसा सूचना), और प्रतिरोधी किस्मों का चुनाव — तीनों पर ध्यान दें। फ़ायदा साफ़ है: अच्छी निगरानी वाला 8-छिड़काव मौसम ₹4,000-5,000 प्रति एकड़ का खर्च, जबकि घबराहट-वाला 12-14 छिड़काव मौसम ₹7,000-10,000+ — और बाद वाले में दवा के अवशेष, प्रतिरोधक क्षमता और पैदावार की सुरक्षा कमज़ोर। सिर्फ़ प्रतिरोधी किस्म (जैसे Kufri Girdhari पछेती-झुलसा-प्रतिरोधी) चुनने से ही छिड़काव खर्च 20-30% तक घट सकता है।
राज्य कृषि विभाग, कृषि विज्ञान केंद्र (KVK), और ICAR-CPRI के क्षेत्रीय केंद्रों में पादप-सुरक्षा विशेषज्ञों से अपने इलाक़े के हिसाब से कार्यक्रम बनवाएं। ऑनलाइन स्रोत (CPRI की वेबसाइट, IMD-CPRI सूचनाएं, राज्य कृषि पोर्टल) पर मौसम और रोग का पूर्वानुमान नियमित देखते रहें। आख़िरी बात: यह गाइड सामान्य ढाँचा है — अपने खेत की किस्म, मिट्टी, मौसम और रोग के इतिहास के हिसाब से योग्य पादप-सुरक्षा विशेषज्ञ से कार्यक्रम तैयार करवाएं।
आगे क्या?
WhatsApp पर रोग की तस्वीर भेजकर सलाह, KVK से संपर्क, और दवाओं के ब्रांड की जानकारी के लिए हमारी टीम से यहाँ जुड़ें। आलू की बाक़ी खेती गाइड्स के लिए आलू खेती, आलू की उन्नत किस्में, और आलू बुवाई का सही समय देखें। प्रसंस्करण और व्यवसाय गाइड्स — चिप्स मैन्युफैक्चरिंग, कोल्ड स्टोरेज, निर्यात, और PMFME योजना पर हैं।
स्रोत और संदर्भ
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
आलू में पहला छिड़काव कब करना चाहिए?▾
पछेती झुलसा (Phytophthora) कैसे पहचानें और कैसे रोकें?▾
पहचान: पत्तियों के किनारों पर पानी से भीगे जैसे गहरे हरे धब्बे, जो जल्दी ही भूरे/काले हो जाते हैं। पत्ती के नीचे सफ़ेद रोयेंदार कवक उग आता है। तने पर काले निशान। कंदों पर भूरापन, ऊबड़-खाबड़ सतह, अंदर से सड़न।
रोकथाम (बचाव): मैन्कोज़ेब 75% WP @ 2 ग्राम/लीटर — हर हफ्ते, खासकर दिसंबर-जनवरी में जब उत्तर भारत के मैदानों में रोग के लिए मौसम अनुकूल होता है।
इलाज: मेटालैक्सिल 8% + मैन्कोज़ेब 64% WP @ 2.5 ग्राम/लीटर — यह अंदर तक जाने वाली और बाहरी सुरक्षा देने वाली दवा का मेल है, 7-10 दिन के अंतराल पर, एक मौसम में अधिकतम 3 छिड़काव (नहीं तो प्रतिरोधक क्षमता बनती है)। साइमोक्सानिल 8% + मैन्कोज़ेब 64% WP @ 3 ग्राम/लीटर भी अच्छा विकल्प है।
खेती के तरीके: प्रतिरोधी किस्में लगाएं (Kufri Girdhari, Kufri Himalini, Kufri Sadabahar — ICAR-CPRI द्वारा जारी), सही दूरी पर रोपाई करें, शाम को ऊपर से सिंचाई न करें, संक्रमित पौधे तुरंत निकाल दें। कई राज्यों में IMD-CPRI मिलकर पछेती झुलसा का पूर्वानुमान देते हैं — उसे ज़रूर देखें।
अगेती झुलसा (Alternaria) के लिए कौन-सी दवा?▾
सुझाई गई दवाएं:
बचाव: मैन्कोज़ेब 75% WP @ 2 ग्राम/लीटर — पौधे की बढ़त के समय (40-70 दिन) हर हफ्ते।
इलाज: क्लोरोथैलोनिल 75% WP @ 2 ग्राम/लीटर, या एज़ोक्सिस्ट्रोबिन 23% SC @ 1 मिली/लीटर (अंदर तक जाने वाली)। मैन्कोज़ेब और एज़ोक्सिस्ट्रोबिन को बारी-बारी से लगाने पर दवा का असर लंबे समय तक बना रहता है।
खेती के तरीके: फसल चक्र अपनाएं (आलू-गेहूं-सोयाबीन से रोग का चक्र टूटता है), पोटाश की कमी न होने दें (कमी से रोग का दबाव बढ़ता है), ज़्यादा नमी वाले क्षेत्र में पौधों के बीच ज़्यादा दूरी रखें, संक्रमित पौधों के अवशेष निकाल दें। पास में टमाटर या जंगली नाइटशेड हों तो दबाव और बढ़ता है — साफ़ करें।
आलू में माहू (चेंपा) और रस चूसने वाले कीटों का इलाज क्या?▾
पहचान: पत्तियों के नीचे हरे/काले मुलायम कीड़े, चिपचिपा शहद-जैसा पदार्थ, पत्तियां मुड़ने लगती हैं, पौधे की बढ़त रुक जाती है। ज़्यादा हमले पर काली कालिख जैसी फफूंदी।
सुझाई गई दवाएं (बारी-बारी लगाएं ताकि प्रतिरोधक क्षमता न बने):
• इमिडाक्लोप्रिड 17.8% SL @ 0.3 मिली/लीटर
• थायामेथोक्सम 25% WG @ 0.4 ग्राम/लीटर
• एसिटामिप्रिड 20% SP @ 0.4 ग्राम/लीटर
• स्पाइरोटेट्रामैट 150 OD @ 1.5 मिली/लीटर (माहू की कॉलोनी पर खास असर)
अन्य रस चूसने वाले कीट: जैसिड, सफेद मक्खी — यही दवाएं असर करती हैं। फुदका (leafhopper) ज़्यादा हो तो डाइमिथोएट 30% EC @ 1.5 मिली/लीटर।
एकीकृत तरीका: पीले चिपचिपे कार्ड (10-15 प्रति एकड़) लगाएं, माहू की संख्या (पत्ती पर 10+ कीड़े) देखकर ही छिड़काव करें, और प्राकृतिक मित्र कीट (लेडीबर्ड बीटल, लेसविंग) बचे रहें इसके लिए सिर्फ़ ज़रूरी जगह पर ही दवा डालें। बीज वाली फसल में माहू नियंत्रण बेहद ज़रूरी है — विषाणु कुछ ही दिनों में फैल जाते हैं।
कंदशलभ (Tuber Moth) से कैसे बचें?▾
खेत में बचाव:
• फेरोमोन ट्रैप (5 प्रति एकड़) — निगरानी और सामूहिक पकड़ के लिए
• बैसिलस थुरिंजिएंसिस (Bt) का छिड़काव — जैविक, जैविक खेती के लिए उपयुक्त
• स्पिनोसैड 45% SC @ 0.3 मिली/लीटर — कंदशलभ पर खास असरदार
• क्लोरांट्रानिलिप्रोल 18.5% SC @ 0.3 मिली/लीटर — लंबा असर
• साइपरमेथ्रिन 25% EC @ 1 मिली/लीटर — सामान्य कीटनाशी (आख़िरी विकल्प)
खेती के तरीके: सही ढंग से मिट्टी चढ़ाना — जो कंद ज़मीन से बाहर निकल जाते हैं उन पर ही पतंगा अंडे देता है। गहरी रोपाई + 30 और 45 दिन पर मिट्टी चढ़ाना — दोनों ज़रूरी। कटाई समय पर पूरी करें (देर से कटाई = कंदशलभ का नुकसान)।
भंडारण में बचाव: कोल्ड स्टोरेज में 8°C से नीचे रखें, आलू के ढेर पर रेत की परत डालें (पुराना तरीका), भंडार में फेरोमोन ट्रैप, और संक्रमित कंद तुरंत निकाल दें।
छिड़काव दिन के किस समय करना चाहिए?▾
सही समय: सुबह 6-10 बजे या शाम 4-7 बजे। इस समय: तापमान कम (दवा जल्दी नहीं उड़ती), हवा कम (दवा फैलती नहीं), ओस सूख चुकी होती है पर पत्ती इतनी गीली रहती है कि दवा अच्छे से सोख ले।
बचें: दोपहर 11 बजे से 3 बजे (तेज़ धूप → दवा जल्दी उड़ जाती है, पत्ती जल सकती है), तेज़ हवा (15 km/h से ज़्यादा — दवा बह जाती है, बराबर नहीं फैलती), 4-6 घंटे में बारिश की संभावना (दवा धुल जाएगी), ज़्यादा ओस (दवा पतली हो जाती है)।
छिड़काव से पहले की जांच: 48 घंटे का मौसम पूर्वानुमान देखें, छिड़काव यंत्र की सही सेटिंग (फफूंदनाशी के लिए होलो कोन नोज़ल, खरपतवारनाशी के लिए फ्लैट फैन), पानी का pH (6.0-6.5 सबसे अच्छा — pH ज़्यादा हो तो नींबू/सिट्रिक एसिड की कुछ बूंदें मिलाएं), और दवाओं का मेल (कुछ फफूंदनाशी और कीटनाशी एक साथ नहीं मिलते)।
सुरक्षा: पूरी बाजू वाले कपड़े, दस्ताने, मास्क, चश्मा। छिड़काव के बाद हाथ-मुंह धोएं। खाली डिब्बे को तीन बार पानी से धोकर ढंग से फेंकें। बच्चे और जानवर खेत से दूर रखें।
दोबारा खेत में जाने का समय: छिड़काव के बाद 24 घंटे तक खेत में न जाएं (दवा के लेबल पर लिखा होता है)।
प्रति एकड़ छिड़काव में कितना खर्च आता है?▾
एक छिड़काव का खर्च: ₹500-900 प्रति एकड़ (दवा + मज़दूरी, पानी अलग)।
पूरा मौसम (8-10 छिड़काव): ₹4,000-7,000 प्रति एकड़।
दवा-वार खर्च (एक छिड़काव, अनुमानित): सिर्फ़ मैन्कोज़ेब ₹250-350; मेटालैक्सिल-मैन्कोज़ेब मेल ₹400-600; इमिडाक्लोप्रिड ₹150-250; क्लोरोथैलोनिल ₹350-500; एज़ोक्सिस्ट्रोबिन ₹500-800; स्पिनोसैड ₹600-1,000; मज़दूरी ₹200-400 प्रति एकड़।
ज़्यादा रोग वाला मौसम (पछेती झुलसा का तेज़ प्रकोप): 12-14 छिड़काव की ज़रूरत, कुल ₹7,000-10,000+ प्रति एकड़।
खर्च घटाने के तरीके: (1) प्रतिरोधी किस्में लगाएं (Kufri Girdhari, Kufri Himalini पछेती झुलसा का दबाव कम करती हैं); (2) रोग-कीट देखकर ही छिड़काव करें (कैलेंडर के हिसाब से नहीं); (3) मौसम से पहले थोक में दवा खरीदें; (4) राज्य की सब्सिडी (बिहार, उत्तर प्रदेश के कई ज़िलों में पौध-सुरक्षा दवाओं पर 50% सब्सिडी मिलती है); (5) सहकारी समिति या FPO के ज़रिए सामूहिक खरीद। पछेती झुलसा के पूर्वानुमान (CPRI-IMD) से छिड़काव का सही समय तय करें।
क्या जैविक या IPM-आधारित छिड़काव कार्यक्रम संभव है?▾
फफूंदनाशी: बोर्डो मिश्रण (1% — कॉपर सल्फेट + चूना), कॉपर हाइड्रॉक्साइड, नीम तेल (1-2%), लहसुन-मिर्च का काढ़ा (घर पर बना)। रासायनिक दवाओं से असर कम है पर लगातार लगाने से सामान्य दबाव संभाला जा सकता है।
कीटनाशी: नीम-आधारित (एज़ाडिराख्टिन 1500 ppm), बैसिलस थुरिंजिएंसिस, NPV (Nuclear Polyhedrosis Virus) — सूंडियों के लिए, ट्राइकोडर्मा विरिडी का मिट्टी में प्रयोग।
जैविक तरीके: मित्र कीट (ट्राइकोग्रामा), शिकारी कीट (लेडीबर्ड बीटल, लेसविंग) छोड़ें। पीले चिपचिपे कार्ड और फेरोमोन ट्रैप सामूहिक पकड़ के लिए।
खेती के तरीके: प्रतिरोधी किस्में, फसल चक्र, संतुलित खाद (नाइट्रोजन ज़्यादा न डालें), सही दूरी, समय पर मिट्टी चढ़ाना।
पैदावार पर असर: अच्छे से चलाए गए IPM/जैविक तंत्र में रासायनिक तंत्र से 15-30% कम पैदावार होती है। जैविक प्रमाणन (APEDA NPOP) के तहत ज़्यादा कीमत मिलने से यह अंतर पाटा जा सकता है। शुरुआत में 2-3 साल का बदलाव-काल लगता है — मिट्टी के अच्छे जीवाणु और मित्र कीट जमने तक। ICAR-CPRI के एकीकृत रोग प्रबंधन परीक्षणों में IPM का अच्छा असर दर्ज है — स्थानीय कृषि विज्ञान केंद्र (KVK) से अपने इलाक़े के हिसाब से सलाह लें।
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