वैश्विक आलू उद्योग — किसानों से लेकर वैज्ञानिकों, प्रजनकों से लेकर व्यापारिक नेताओं तक — को आकार देने में महिलाओं की भूमिका हमेशा से महत्वपूर्ण रही है। लेकिन उनकी कहानियाँ शायद ही कभी सुर्ख़ियों में आती हैं। शिवानी भानवडिया की कहानी इसका अपवाद है — गुजरात के आनंद से शुरू होकर नीदरलैंड्स, आयरलैंड और वापस भारत तक फैली एक यात्रा, जो दिखाती है कि विज्ञान, दृढ़ संकल्प और उद्योग के मिलन से क्या सम्भव है।

आलू उद्योग में महिलाओं का नेतृत्व क्यों महत्वपूर्ण है
भारत में आलू सबसे महत्वपूर्ण सब्ज़ी फसल है — 55 मिलियन टन से अधिक वार्षिक उत्पादन के साथ। किसान, वैज्ञानिक, प्रजनक, प्रसंस्करणकर्ता और व्यापारी — इस विशाल मूल्य श्रृंखला के हर स्तर पर महिलाओं की भूमिका अहम है। भारतीय आलू खेती में श्रम बल का लगभग 75% महिलाएँ हैं — बुवाई से लेकर कटाई, छँटाई से लेकर भंडारण तक। फिर भी प्रसंस्करण क्षेत्र में 10% से कम नेतृत्व पद महिलाओं के पास हैं।
शिवानी भानवडिया इस अंतर को पाटने वाली उन कुछ महिलाओं में से एक हैं — जिन्होंने अनुसंधान प्रयोगशाला से शुरू करके उद्योग के शीर्ष तक का सफ़र तय किया।
शिवानी भानवडिया कौन हैं
शिवानी का जन्म और पालन-पोषण गुजरात के आनंद में एक पटेल कृषि परिवार में हुआ। उनके पिता डॉ. अजय भानवडिया — आनंद कृषि विश्वविद्यालय (AAU) में कृषि विज्ञानी और प्रोफ़ेसर हैं। शिवानी बचपन से अनुसंधान केंद्रों का दौरा करती रहीं, फ़ील्ड ट्रायल देखती रहीं — विज्ञान और खेती उनके रक्त में है।
उनका करियर गुजरात → नीदरलैंड्स → आयरलैंड → वापस भारत तक फैला है। आज वे भारत की सबसे बड़ी चुनौती — उपयुक्त प्रसंस्करण आलू किस्मों की कमी — को हल करने में लगी हैं।
शैक्षणिक उत्कृष्टता — स्वर्ण पदक से वैश्विक शोध तक
शिवानी ने आनंद कृषि विश्वविद्यालय से B.Sc. Agriculture Honours किया — और 11 स्वर्ण पदक जीते, जिनमें कुलपति का स्वर्ण पदक भी शामिल है। इसके बाद उन्होंने वैगनिंगेन विश्वविद्यालय (नीदरलैंड्स) में MSc प्लांट बायोटेक्नोलॉजी चुना, जहाँ उन्होंने आणविक पादप प्रजनन और रोगविज्ञान में विशेषज्ञता हासिल की।
वैगनिंगेन को चुनने का कारण स्पष्ट था — नीदरलैंड्स को "कृषि की घाटी" और "विश्व का खाद्य कटोरा" कहा जाता है। QS रैंकिंग में लगातार दो दशकों से विश्व का #1 कृषि विश्वविद्यालय। यही वह देश है जहाँ आलू प्रजनन के वैश्विक केंद्र — HZPC, Agrico, Solynta — सभी का मुख्यालय है।
लेट ब्लाइट से लड़ाई — वैगनिंगेन और सेंसबरी लैब में प्रतिरोध प्रजनन
शिवानी की प्रमुख शोध परियोजना थी पाइपर प्लस प्रोजेक्ट — वैगनिंगेन विश्वविद्यालय और ब्रिटेन की सेंसबरी लेबोरेटरी के बीच एक सहयोगी शोध।
इस प्रोजेक्ट में उन्होंने मैरिस पाइपर किस्म (ब्रिटेन की सबसे प्रतिष्ठित आलू किस्म — जैसे भारत में कुफरी पुखराज) का आनुवंशिक रूप से उन्नत संस्करण विकसित किया। उन्होंने सोलेनम अमेरिकनम (एक जंगली आलू प्रजाति) से प्रतिरोध जीन को मैरिस पाइपर में स्थानांतरित (introgress) किया और इसका फ़ाइटोफ़्थोरा इन्फ़ेस्टन्स (लेट ब्लाइट रोगजनक) के 25 सबसे विषाणुजनक आइसोलेट्स के विरुद्ध मूल्यांकन किया।
यह शोध इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि लेट ब्लाइट ने ही आयरिश आलू अकाल (1845-1852) का कारण बना था — और आज भी यह रोग विश्वभर में अरबों डॉलर की फसल हानि करता है।
HZPC हॉलैंड में TPS (ट्रू पोटैटो सीड) इनोवेशन
अपनी MSc के बाद शिवानी HZPC हॉलैंड में शामिल हुईं — विश्व की सबसे बड़ी आलू प्रजनन और बीज व्यापार कंपनियों में से एक। उन्होंने मेट्सलावियर स्थित प्रजनन स्टेशन में प्री-ब्रीडिंग टीम के साथ काम किया।
यहाँ उनका मुख्य योगदान था ट्रू पोटैटो सीड (TPS) अंकुरण प्रोटोकॉल को मानकीकृत करना। TPS तकनीक में आलू को कंदों की बजाय वानस्पतिक बीजों से उगाया जाता है — जो परिवहन लागत को 99% तक कम कर सकता है और रोग चक्र को तोड़ सकता है। उन्होंने अंकुरों का शारीरिक लक्षणों, जैविक और अजैविक प्रतिरोध के लिए मूल्यांकन किया।
"हाइब्रिड आलू किस्मों के विकास का अफ्रीका जैसे देशों की खाद्य आपूर्ति पर सीधा प्रभाव पड़ता है। मुझे आश्चर्य नहीं होगा अगर यह लंबे समय में आलू की दुनिया में क्रांति ला दे।" — शिवानी भानवडिया
TPS तकनीक भारत जैसे विकासशील देशों के लिए क्रांतिकारी हो सकती है — जहाँ गुणवत्तापूर्ण बीज आलू की आपूर्ति श्रृंखला कमज़ोर है और दूर-दराज़ क्षेत्रों तक पहुँचना कठिन। आलू किस्मों के बारे में विस्तृत जानकारी यहाँ देखें।
भारत वापसी — टेक्निको एग्री साइंसेज़ में भारतीय परिस्थितियों के लिए प्रजनन
भारत के तेज़ी से बढ़ते आलू प्रसंस्करण उद्योग की अपार संभावनाओं को पहचानते हुए, शिवानी भारत लौटीं और टेक्निको एग्री साइंसेज़ (ITC लिमिटेड का बीज आलू प्रभाग) में सीनियर ऑफिसर R&D के रूप में चंडीगढ़ में शामिल हुईं।
यहाँ उन्होंने भारत के सभी 8 प्रमुख आलू उत्पादक भूगोलों — पंजाब, उत्तर प्रदेश, कर्नाटक, पश्चिम बंगाल, गुजरात, हिमाचल प्रदेश और अन्य — में अखिल भारतीय किस्म परीक्षण का प्रबंधन किया। वैश्विक प्रजनकों के साथ सहयोग करते हुए उन्होंने भारतीय परिस्थितियों के लिए उपयुक्त किस्मों की पहचान की — तीनों खंडों के लिए: वेयर (टेबल), फ्रेंच फ्राइज़ प्रसंस्करण, और चिप्स (क्रिस्पिंग)।
लगभग 3 वर्षों के इस अनुभव ने उन्हें भारतीय आलू खेती के कृषि विज्ञान की गहरी समझ दी।
आयरलैंड अध्याय — टीगास्क में आलू प्रजनन
इसके बाद शिवानी ने मंस्टर टेक्नोलॉजिकल यूनिवर्सिटी (MTU), आयरलैंड से MSc इंटरनेशनल बिज़नेस किया। साथ ही उन्होंने टीगास्क (Teagasc — आयरलैंड की राष्ट्रीय खाद्य एवं कृषि अनुसंधान संस्था) में आलू प्रजनन टीम के साथ काम किया — आयरिश और वैश्विक बाज़ारों के लिए किस्मों का मूल्यांकन करते हुए।
यह एक दुर्लभ संयोजन है — अनुसंधान प्रमाण-पत्र + अंतरराष्ट्रीय व्यापार अनुभव — जो शिवानी को उद्योग में एक अलग पहचान देता है।
वर्तमान भूमिका — HyFun Foods में प्रोडक्ट मैनेजर
शिवानी अब HyFun Foods (मेहसाणा, गुजरात) में काम कर रही हैं — भारत की अग्रणी फ्रोज़न फ्रेंच फ्राइज़ और आलू विशेष उत्पाद प्रसंस्करण कंपनी। वे बीज उत्पादन, व्यावसायिक खेती और विनिर्माण के चौराहे पर काम करती हैं — कृषि और औद्योगिक पक्षों के बीच सेतु का काम करते हुए।
उनका ध्यान है: ऐसी नई प्रसंस्करण किस्मों की पहचान करना जो दोहरी आवश्यकताओं को पूरा करें — उत्कृष्ट फ्राई गुणवत्ता और भारतीय परिस्थितियों के लिए मज़बूत कृषि विज्ञान (उच्च उपज, भंडारण क्षमता, कीट प्रतिरोध)। उनका अनूठा मूल्य यह है कि वे किस्मों का वैज्ञानिक और व्यावसायिक दोनों दृष्टिकोणों से मूल्यांकन कर सकती हैं।
उनका अनुभव सम्पूर्ण आलू पाइपलाइन में फैला है: जेनेटिक्स लैब → किसान का खेत → प्रसंस्करणकर्ता की उत्पादन लाइन।
"मुझे पौधे पसंद हैं और मुझे आलू पसंद है। भारत में आलू उद्योग तेज़ी से बढ़ रहा है। और यही मेरी जड़ है — यही मेरी सबसे बड़ी प्रेरणा थी कि मैं वापस आऊँ और असली आलू कृषि विज्ञान और प्रजनन के व्यवसाय को समझूँ।" — शिवानी भानवडिया
भारत की प्रसंस्करण आलू किस्मों की कमी को पूरा करना
भारत की सबसे बड़ी चुनौती: सिर्फ 1-2 प्रसंस्करण किस्मों पर भारी निर्भरता। किस्म विविधता की कमी = आपूर्ति श्रृंखला जोखिम, गुणवत्ता सीमाएँ, और निर्यात वृद्धि में बाधा। शिवानी का HyFun में काम: भारतीय परिस्थितियों के लिए नई प्रसंस्करण किस्मों की पाइपलाइन बनाना — जो QSR और निर्यात गुणवत्ता मानकों को भी पूरा करें। Indian Potato डायरेक्टरी में प्रसंस्करण कंपनियों की सूची देखें।
करियर टाइमलाइन
शिवानी जैसी महिलाएँ भारत के आलू उद्योग को नई दिशा दे रही हैं। खेत की कहानी पढ़ें — मीनाबेन पटेल: गुजरात की महिला किसान | अपनी कहानी साझा करें — WhatsApp पर भेजें
शिवानी भानवडिया कौन हैं और आलू उद्योग में उनका क्या योगदान है
शिवानी भानवडिया गुजरात के आनंद की एक पादप वैज्ञानिक हैं जिनका करियर तीन महाद्वीपों — भारत, नीदरलैंड्स और आयरलैंड — में फैला है। आनंद कृषि विश्वविद्यालय से 11 स्वर्ण पदक, वैगनिंगेन से MSc, HZPC में TPS शोध, ITC टेक्निको में अखिल भारतीय किस्म परीक्षण, और अब HyFun Foods में प्रसंस्करण किस्म विकास — उनका योगदान सम्पूर्ण आलू पाइपलाइन में है।
पाइपर प्लस प्रोजेक्ट क्या है
पाइपर प्लस प्रोजेक्ट वैगनिंगेन विश्वविद्यालय और ब्रिटेन की सेंसबरी लेबोरेटरी का सहयोगी शोध है। इसमें शिवानी ने ब्रिटेन की प्रतिष्ठित मैरिस पाइपर किस्म में सोलेनम अमेरिकनम (जंगली आलू प्रजाति) से प्रतिरोध जीन स्थानांतरित किए और फ़ाइटोफ़्थोरा इन्फ़ेस्टन्स (लेट ब्लाइट रोगजनक) के 25 सबसे विषाणुजनक आइसोलेट्स के विरुद्ध इसका परीक्षण किया।
TPS (ट्रू पोटैटो सीड) तकनीक क्या है और भारत के लिए इसका क्या महत्व है
TPS तकनीक में आलू को कंदों की बजाय वानस्पतिक बीजों से उगाया जाता है। इससे परिवहन लागत 99% तक कम होती है, कंद जनित रोगों का चक्र टूटता है, और बीज वर्षों तक साधारण तापमान पर भंडारित रहते हैं। भारत के लिए यह विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि यहाँ गुणवत्तापूर्ण बीज आलू की भारी कमी है और दूर-दराज़ क्षेत्रों तक बीज कंद पहुँचाना कठिन और महँगा है।
भारत में प्रसंस्करण आलू किस्मों की कमी क्यों एक बड़ी चुनौती है
भारत सिर्फ 1-2 प्रसंस्करण किस्मों पर अत्यधिक निर्भर है। किस्म विविधता की कमी से आपूर्ति श्रृंखला जोखिम बढ़ता है, गुणवत्ता सीमित रहती है, और निर्यात वृद्धि में बाधा आती है। भारत का आलू प्रसंस्करण उद्योग तेज़ी से बढ़ रहा है (फ्रोज़न फ्राइज़, चिप्स, फ्लेक्स) — इसके लिए ऐसी किस्में चाहिए जो उत्कृष्ट फ्राई गुणवत्ता और भारतीय जलवायु दोनों के लिए उपयुक्त हों।