आलू की खेती कैसे करें — बुआई से कटाई तक पूरी गाइड (2026)
आलू की खेती की पूरी जानकारी — सही समय, बीज दर, खाद, सिंचाई, रोग प्रबंधन, कीट नियंत्रण, खुदाई और भंडारण। ICAR-CPRI डेटा पर आधारित।
7 अप्रैल 202617 मिनट पढ़ें
आलू की खेती कैसे करें — बुआई से कटाई तक पूरी गाइड (2026)
भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा आलू उत्पादक देश है — 2024-25 में लगभग 581 लाख टन (58.1 मिलियन टन) आलू का उत्पादन हुआ। उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, बिहार, गुजरात, पंजाब, मध्य प्रदेश, राजस्थान और महाराष्ट्र प्रमुख आलू उत्पादक राज्य हैं। आलू मुख्य रूप से रबी (सर्दी) की फसल है — अक्टूबर-नवंबर में बुआई और फरवरी-मार्च में कटाई होती है। इस लेख में हम आलू की खेती कैसे करें — जलवायु, मिट्टी, बीज, खाद, सिंचाई, रोग प्रबंधन, कटाई और भंडारण तक — हर चरण की विस्तृत जानकारी देंगे।
आलू की खेती कैसे करें — पूरी गाइड
आलू की खेती के लिए जलवायु और मिट्टी
आलू की अच्छी फसल के लिए सही जलवायु और मिट्टी सबसे ज़रूरी है।
जलवायु:
आदर्श तापमान — 15-25°C | कंद बनने के लिए 15-20°C रात का तापमान सबसे उपयुक्त
बीज अंकुरण — मिट्टी का तापमान लगभग 25°C होना चाहिए
30°C से अधिक तापमान पर कंद बनना बंद हो जाता है — इसीलिए आलू रबी (ठंडी) फसल है
पाला (frost) पत्तियों को नुकसान पहुँचाता है — तापमान 0°C से नीचे जाने पर फसल को ढकना आवश्यक
मिट्टी:
सर्वोत्तम मिट्टी — बलुई दोमट (sandy loam) जिसमें जल निकास अच्छा हो
pH — 5.5 से 7.0 के बीच (हल्की अम्लीय से उदासीन)
भारी चिकनी मिट्टी (clay) में आलू की खेती ना करें — कंद विकृत होते हैं और रोग अधिक लगते हैं
जलभराव (waterlogging) वाले खेतों में आलू कभी नहीं लगाएँ — सड़न हो जाती है
खेत की 2-3 बार गहरी जुताई करें, मिट्टी भुरभुरी होनी चाहिए
आलू बोने का सही समय — क्षेत्रवार जानकारी
आलू बोने का सही समय क्षेत्र और जलवायु पर निर्भर करता है। ग़लत समय पर बुआई से पैदावार में 30-50% तक कमी हो सकती है।
उत्तर भारत मैदान (UP, बिहार, पंजाब, हरियाणा, पश्चिम बंगाल) — अक्टूबर पहले सप्ताह से नवंबर अंत तक | अगेती किस्में (कुफरी पुखराज) अक्टूबर में, मध्यम किस्में (कुफरी ज्योति) अक्टूबर अंत-नवंबर में
पहाड़ी क्षेत्र (हिमाचल, उत्तराखंड, मेघालय, नीलगिरी) — वसंत फसल: फरवरी-मार्च बुआई, जुलाई-अगस्त कटाई | शरद फसल: अगस्त-सितंबर बुआई, नवंबर-दिसंबर कटाई
पठारी क्षेत्र (महाराष्ट्र, कर्नाटक) — अक्टूबर-नवंबर | पिछेती किस्म (कुफरी लवकार) उपयुक्त
दक्षिण भारत (गुजरात, तमिलनाडु) — सिंचाई उपलब्ध हो तो वर्ष भर खेती संभव | कुफरी सूर्या (गर्मी सहनशील) विशेष रूप से उपयुक्त
बीज दर और बुआई विधि — 1 बीघा में कितने आलू बोएं
बीज की सही मात्रा और बुआई विधि पैदावार को सीधे प्रभावित करती है।
बीज दर:
प्रति हेक्टेयर — 20-25 क्विंटल प्रमाणित बीज
1 बीघा में कितने आलू बोए जाते हैं — लगभग 8-10 क्विंटल (UP में 1 बीघा ≈ 2,500 वर्ग मीटर) | यह मात्रा कंद के आकार और किस्म पर निर्भर करती है
बीज का आकार — 30-40 ग्राम (अंडे जितना) आदर्श | बड़े कंदों को 2-3 आँख वाले टुकड़ों में काटें, कटे भाग पर थीरम पाउडर लगाएँ
बुआई विधि:
कतार दूरी — 50-60 सेमी (लाइन से लाइन)
पौध दूरी — 15-20 सेमी (पौधे से पौधे)
गहराई — 5-7 सेमी
विधि — मेड़ (ridge) विधि सबसे उपयुक्त | मेड़ पर 5-7 सेमी गहरी नालियाँ बनाकर बीज रखें और मिट्टी से ढकें
बीज उपचार — बुआई से पहले बीज को 0.25% मैंकोज़ेब या 3 ग्राम/लीटर कार्बेन्डाज़िम के घोल में 15-20 मिनट डुबोएँ — फफूंद रोग से बचाव
खाद और उर्वरक प्रबंधन — आलू को मोटा करने के लिए क्या डालें
"आलू को मोटा करने के लिए क्या डालें" — यह सवाल हर किसान पूछता है। जवाब है: पोटाश (K₂O), उचित मिट्टी चढ़ाना (earthing up), और समय पर सिंचाई।
गोबर खाद (FYM):
20-25 टन/हेक्टेयर सड़ी हुई गोबर खाद बुआई से 15-20 दिन पहले खेत में मिलाएँ
ताज़ा गोबर कभी ना डालें — रोग और कीट को बढ़ावा देता है
रासायनिक उर्वरक (NPK अनुशंसा प्रति हेक्टेयर):
नाइट्रोजन (N) — 150-200 किलो | आधा बुआई के समय, आधा मिट्टी चढ़ाते समय (30-35 दिन बाद)
फास्फोरस (P₂O₅) — 80-100 किलो | पूरा बुआई के समय
पोटाश (K₂O) — 100-120 किलो | पूरा बुआई के समय | पोटाश आलू को मोटा करने, छिलके की गुणवत्ता सुधारने और भंडारण क्षमता बढ़ाने में सबसे महत्वपूर्ण तत्व है
आलू को मोटा करने के उपाय:
पर्याप्त पोटाश — K₂O की कमी से कंद छोटे रहते हैं
मिट्टी चढ़ाना (earthing up) — बुआई के 25-30 दिन और 45-50 दिन बाद मिट्टी चढ़ाएँ | यह कंद विकास के लिए जगह बनाता है और हरा होने से बचाता है
समय पर सिंचाई — कंद बनने और बढ़ने के समय (stolonization और tuber bulking) पानी की कमी से कंद छोटे रहते हैं
अत्यधिक नाइट्रोजन से बचें — ज़्यादा नाइट्रोजन से पत्तियाँ बढ़ती हैं लेकिन कंद नहीं बढ़ते
आलू की सिंचाई — कब और कितनी
आलू की सिंचाई फसल की सफलता का सबसे निर्णायक कारक है। सही समय पर सिंचाई ना मिले तो पैदावार 40-50% तक गिर सकती है।
कुल पानी की ज़रूरत — 400-500 मिमी पूरे फसल मौसम में
पहली सिंचाई — बुआई के 3-5 दिन बाद (हल्की सिंचाई, बीज अंकुरण के लिए)
अगली सिंचाइयाँ — हर 7-10 दिन पर (मिट्टी और मौसम के अनुसार)
सबसे ज़रूरी समय (Critical stages):
- अंकुरण (Emergence) — पानी की कमी से अंकुरण असमान होता है
- स्टोलन बनना (Stolonization) — बुआई के 30-40 दिन बाद | कंद बनने की शुरुआत
- कंद बढ़ना (Tuber bulking) — बुआई के 40-80 दिन बाद | सबसे ज़रूरी — इस दौरान पानी की कमी से कंद छोटे, दरारें वाले और खोखले होते हैं
सिंचाई बंद करना — कटाई से 10-15 दिन पहले सिंचाई बंद करें | इससे छिलका सख़्त होता है और भंडारण में आलू टिकता है
ड्रिप सिंचाई — 30-40% पानी की बचत | सरकार ड्रिप पर 50-80% सब्सिडी देती है
आलू में लगने वाले रोग फसल को बर्बाद कर सकते हैं — विशेषकर पिछेती झुलसा (Late blight) जिसने 1845 में आयरलैंड का अकाल पैदा किया था। प्रमुख रोग:
पिछेती झुलसा (Late blight) — कारक: Phytophthora infestans | सबसे विनाशकारी रोग | पत्तियों पर भूरे-काले धब्बे, नम मौसम में तेज़ी से फैलता है, पूरी फसल 7-10 दिन में नष्ट हो सकती है | उपचार: मैंकोज़ेब 0.25% या मेटालैक्सिल + मैंकोज़ेब का छिड़काव हर 7-10 दिन पर | बचाव: प्रतिरोधी किस्में (कुफरी ज्योति, कुफरी गिरधारी) लगाएँ
अगेती झुलसा (Early blight) — कारक: Alternaria solani | पत्तियों पर गहरे भूरे गोल धब्बे (concentric rings) | उपचार: मैंकोज़ेब या क्लोरोथैलोनिल का छिड़काव
काला चूर्ण (Black scurf) — कारक: Rhizoctonia solani | कंद पर काले छिलके जैसी फफूंद | उपचार: बीज उपचार — बोरिक एसिड 3% या कार्बेन्डाज़िम 0.1% में बीज डुबोएँ
मृदु सड़न (Soft rot) — जीवाणु जनित (bacterial) | भंडारण में कंद गलकर बदबूदार हो जाते हैं | बचाव: क्षतिग्रस्त कंद कभी स्टोर ना करें, कोल्ड स्टोर का तापमान 2-4°C रखें
विषाणु रोग (Viral diseases) — लीफ रोल (पत्ती मुड़ना), मोज़ेक (पत्तियों पर हरे-पीले धब्बे) | एफिड (माहू) कीट से फैलते हैं | बचाव: प्रमाणित वायरस-मुक्त बीज ही उपयोग करें, एफिड नियंत्रण ज़रूरी
आलू के कीट और रोकथाम
आलू पतंगा (Potato tuber moth) — लार्वा कंदों में सुरंग बनाता है, भंडारण में भी नुकसान | रोकथाम: कंदों को मिट्टी से अच्छी तरह ढकें (earthing up), भंडारण में BT (Bacillus thuringiensis) धूल का उपयोग
कटवर्म (Cutworm) — रात में पौधे के तने को ज़मीन के पास से काट देता है | रोकथाम: क्लोरपायरीफॉस 20EC (2.5 लीटर/हेक्टेयर) की ड्रेंचिंग
एफिड/माहू (Aphids) — वायरस रोग फैलाने वाला सबसे ख़तरनाक कीट | पत्तियों से रस चूसते हैं और लीफ रोल/मोज़ेक वायरस फैलाते हैं | रोकथाम: इमिडाक्लोप्रिड 0.5 मिली/लीटर या नीम तेल 5 मिली/लीटर का छिड़काव
अनुमानित उपज — 80-120 क्विंटल/बीघा (किस्म और प्रबंधन पर निर्भर)
थोक भाव — ₹500-1,500/क्विंटल (मौसम और बाज़ार पर निर्भर)
अनुमानित आय — ₹40,000-1,50,000 प्रति बीघा
शुद्ध लाभ — ₹15,000-1,15,000 प्रति बीघा (भाव पर बहुत निर्भर)
ध्यान दें: मुनाफ़ा पूरी तरह बाज़ार भाव पर निर्भर करता है। अगेती फसल (जनवरी कटाई) और कोल्ड स्टोर (जुलाई-सितंबर बिक्री) से भाव का जोखिम कम किया जा सकता है।
आलू की खेती के लिए: (1) बलुई दोमट मिट्टी, pH 5.5-7.0 का चयन करें (2) अक्टूबर-नवंबर में बुआई करें (उत्तर भारत मैदान) (3) प्रमाणित बीज 20-25 क्विंटल/हेक्टेयर की दर से 50-60 सेमी कतार दूरी और 15-20 सेमी पौध दूरी पर लगाएँ (4) NPK 150:80:100 kg/ha खाद दें (5) हर 7-10 दिन सिंचाई करें (6) 25-30 और 45-50 दिन बाद मिट्टी चढ़ाएँ (7) लेट ब्लाइट से बचाव के लिए मैंकोज़ेब छिड़काव (8) 90-100 दिन बाद खुदाई करें। किस्मों की जानकारी →
1 बीघा में कितने आलू बोए जाते हैं?
UP में 1 बीघा (≈ 2,500 वर्ग मीटर) में लगभग 8-10 क्विंटल बीज आलू बोया जाता है। यह मात्रा कंद के आकार (30-40 ग्राम आदर्श), किस्म और बुआई विधि पर निर्भर करती है। छोटे बीज (25-30 ग्राम) लगाने पर 7-8 क्विंटल, बड़े बीज (40-50 ग्राम) लगाने पर 10-12 क्विंटल प्रति बीघा लग सकते हैं। कतार दूरी 50-60 सेमी और पौध दूरी 15-20 सेमी रखें।
आलू बोने का सही समय क्या है?
उत्तर भारत मैदान (UP, बिहार, पंजाब) में आलू बोने का सही समय अक्टूबर पहले सप्ताह से नवंबर अंत तक है। अगेती किस्में (कुफरी पुखराज) अक्टूबर में और मध्यम किस्में (कुफरी ज्योति) नवंबर तक बोई जा सकती हैं। पहाड़ी क्षेत्रों में फरवरी-मार्च (वसंत) और अगस्त-सितंबर (शरद) दो सीज़न होते हैं। देरी से बुआई करने पर तापमान बढ़ने से कंद बनना प्रभावित होता है और पैदावार गिरती है।
आलू को मोटा करने के लिए क्या डालें?
आलू को मोटा (बड़ा) करने के लिए: (1) पर्याप्त पोटाश (K₂O) — 100-120 kg/हेक्टेयर | पोटाश कंद के आकार, वज़न और गुणवत्ता सीधे बढ़ाता है (2) समय पर मिट्टी चढ़ाना — 25-30 और 45-50 दिन बाद | कंद को बढ़ने की जगह मिलती है (3) नियमित सिंचाई — कंद बढ़ने के समय (40-80 दिन) पानी की कमी से कंद छोटे रहते हैं (4) अत्यधिक नाइट्रोजन से बचें — ज़्यादा N से पत्तियाँ बढ़ती हैं लेकिन कंद नहीं।
आलू में लगने वाले रोग कौन से हैं?
आलू के प्रमुख रोग: (1) पिछेती झुलसा (Late blight) — सबसे ख़तरनाक, Phytophthora infestans फफूंद से, पूरी फसल नष्ट कर सकता है (2) अगेती झुलसा (Early blight) — Alternaria solani, पत्तियों पर भूरे गोल धब्बे (3) काला चूर्ण (Black scurf) — कंद पर काली पपड़ी (4) मृदु सड़न — भंडारण में कंद गलना (5) विषाणु रोग — लीफ रोल, मोज़ेक — एफिड कीट से फैलते हैं। बचाव के लिए प्रतिरोधी किस्में लगाएँ, प्रमाणित बीज उपयोग करें, और समय पर फफूंदनाशक छिड़काव करें।
आलू की सिंचाई कब करें?
पहली सिंचाई बुआई के 3-5 दिन बाद (हल्की)। उसके बाद हर 7-10 दिन पर। सबसे ज़रूरी समय: कंद बनना (30-40 दिन) और कंद बढ़ना (40-80 दिन) — इस दौरान पानी की कमी बर्दाश्त नहीं। कटाई से 10-15 दिन पहले सिंचाई बंद करें ताकि छिलका सख़्त हो। कुल पानी: 400-500 मिमी पूरे सीज़न में। ड्रिप सिंचाई से 30-40% पानी बचत संभव।
सबसे ज्यादा पैदावार देने वाला आलू कौन सा है?
कुफरी पुखराज भारत में सबसे ज़्यादा पैदावार देने वाली किस्म है — 350-400 क्विंटल/हेक्टेयर (80-120 क्विंटल/बीघा)। यह अगेती किस्म है जो 70-80 दिन में तैयार होती है। उत्तर प्रदेश, बिहार, पंजाब और हरियाणा के किसानों में सबसे लोकप्रिय। प्रसंस्करण किस्मों में कुफरी चिप्सोना-4 (300-350 क्विंटल/हेक्टेयर) सबसे अधिक उपज देती है। सभी किस्मों की तुलना →
स्रोत: ICAR-CPRI (केंद्रीय आलू अनुसंधान संस्थान), शिमला — खेती अनुशंसाएँ; कृषि विज्ञान केंद्र (KVK) प्रकाशन; FAOSTAT 2023; CIP (अंतरराष्ट्रीय आलू केंद्र); NHRDF (राष्ट्रीय बागवानी अनुसंधान एवं विकास प्रतिष्ठान); राज्य कृषि विभाग अनुशंसाएँ। नोट: उर्वरक, कीटनाशक और फफूंदनाशक की मात्रा स्थानीय KVK/कृषि अधिकारी से पुष्टि करके ही उपयोग करें।
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